घंटिका बजत इम कहै रे मन मूरिख जागि।
आव गलै योवन खिसै उट्ठि उठि धर्म्मह लागि॥
घड़ी घड़ी घड़ियालु सद्द इह एम चवंती।
मूरिख आलस छोड़ि आव खिणि खिणि खय जंती॥
जागि जुगति करि धर्म्मु सत्य मारग मत मेटो।
को जाणै किस वार काल रिपु देइ चपेटो॥
अति मोह जाल बसि पड़उ मति कहै मान उल्हास करि।
जिहि सतु कयतह सारिखो सो क्यों सोवइ निंद भरि॥