इह संसार असार, सवु मे मे करि मम भूल्लि लुटण काजि कुटुम्ब सबु दुक्ख दिंहि जि बलिंत लूटि चोरि धनु लेत हो सो सबु देखत जाइ उदधि छिपै अह वनि छिपै यहु सवु सरणु निरेथु