जैन कवि मान
जैन कवि, मान बावनी रा रचयिता
जैन कवि, मान बावनी रा रचयिता
अंबह सींचि सयाण तुव मकरि धतूरहं खेद
चक्खि पिक्खियोबन खिसत देखिण कर्महं दाउ
दर्प्पण में धन देखि करि मूरिख लेण कहंति
डसण कसन कंचन सहिउ गुण पीत तन चुक्क
धर्म्मु धर्म्मु सबु जग कहत धर्मु न कोइ लहंति
फणि विष सरिसो लोभ यहु मिति न सुपिनै रिज्झि
गर्भवास दुखवास बहु मित्त न किजै नेहु
घंटिका बजत इम कहै रे मन मूरिख जागि
इह संसार असार, सवु मे मे करि मम भूल्लि
जण भुल्ला परमत्थ पद लग्ग कुटुंबह सत्थ
जिहि दिन वित्त न आपणै तिहिं दिन मित्त न कोइ
कलि में नर एहा घणा, मनि कपटी मुख मिट्ठ
करउ क्षिमा क्षिण एक क्षिण जै गुरु सीख सुणंत
खरउ जु तपु जोवन अछत बूढ पणै नवि हुंति
लुटण काजि कुटुम्ब सबु दुक्ख दिंहि जि बलिंत
लूटि चोरि धनु लेत हो सो सबु देखत जाइ
निजु ब्रत कारण जानकी दस सिर हथु न दिन्ह
ओ नम सिद्ध पढंत तुव आलस मकरि गंवार
औषध अन्न दया सु तह यहु बहु दान हे सत्थु
सरवर एहु सरीर जिहिं णव णाल वहंत
तरवर फल पर कारणै आपु न एकु न खंति
ठग ठग सगळी छंडि तुव मोह खड़ग अति तिक्ख
उदधि छिपै अह वनि छिपै यहु सवु सरणु निरेथु