कवित्त4 इह संसार असार, सवु मे मे करि मम भूल्लि उदधि छिपै अह वनि छिपै यहु सवु सरणु निरेथु लुटण काजि कुटुम्ब सबु दुक्ख दिंहि जि बलिंत लूटि चोरि धनु लेत हो सो सबु देखत जाइ