लोयण भरि निरखंत, कांम मुख कथा वखाणै।

आंगुळीयां मोड़ंत, कहै मन रीस न आणै।

आळस भांजै अंगि, कठिन कुच उदर दिखावै।

सखी कंठ करि पासि, घालि निज हंसै हंसावै।

सुकमाल बाल भीड़ै हीयै, बाइक मिट्ठ वखांणीयै।

जिनहरख कहै त्री रागिनी, इण आचरणे जाणीयै॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर ,
  • संस्करण : प्रथम
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