खरउ जु तपु जोवन अछत बूढ पणै नवि हुंति।

अंग उपंग समस्त खलुख खलु होइ जंत॥

खरो कष्ट वृद्ध पणै सीस तरवर जिम हलै।

नयण झरै तिम झरण नाक नाला जिम चलै॥

बोलत लाळ पंडत कर्णि कछु अवर सुणं तो।

दंत गिरै फलु जेम वदन वावीसउ हुंतो॥

कफु गहै कंठ खैं खैं अधिकु जणकु जरा णच्चण कछत।

कछु जपु तपु संयमु मान भणि हो करि करि करि योवन अछत॥

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : जैन कवि मान ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : अक्टूबर
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