जाके आछे तीछे नयण, आछे ही रसीले वयण,

चातुरी ही आछी जाकी, आछउ गोरउ गात है।

आछी ही चलत चाल, आछे ही कपोल गाल,

आछे ही अधर लाल, आछी आछी बात है।

आछो ही दखिण चीर, आछी कंचुक वीचि हीर,

आछी ही पहिर सारी, आछी ही कहातु है।

आछी ही पायल वाजइ, आछी घुंघराळी छाजइ,

‘जसराज’ गोरी भोरी, आछी आछी जातु है॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर ,
  • संस्करण : प्रथम
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