गोरउ सउ गात रसीली सी बात, सुहात मदन की छाक छकी है।
रूप की आगर प्रेम सुधाकर, रामति नागर लोकन की है।
नाहर लंक मयंद निसंक, चलइ गति कंकण छय्यल तकी है।
घुंघट की ओट में चोट करइ, ‘जसराज’ सनमुख आय धकी है॥