औषध अन्न दया सु तह यहु बहु दान हे सत्थु।
वित्त सारी पत्तहं परखि दिंत न खंचहु हथु॥
औषध पत्त अहारु ज्ञान दय दान जुगरवा।
अवरु जको कछु कहै तितो सबु जाणो हलुवा॥
औषध फलहिं न रोग अन्न फल सुक्खहं पूरौ।
ज्ञान फलि मतिवंत दया फल निर्भय सूरौ॥
एच्यारि दान बहु भाव करि कहै चतुर मति मान इम।
आपणी सकति सारू सदा हो देत विलंब न करउ तुम्ह॥