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धन पर कवित्त
कवित्त
पद
कहाणी
दूहा
उद्धरण
कविता
छंद
गीत
चौपाई
एकांकी
कवित्त
8
औषध अन्न दया सु तह यहु बहु दान हे सत्थु
जैन कवि मान
अंबह सींचि सयाण तुव मकरि धतूरहं खेद
जैन कवि मान
जिहि दिन वित्त न आपणै तिहिं दिन मित्त न कोइ
जैन कवि मान
दर्प्पण में धन देखि करि मूरिख लेण कहंति
जैन कवि मान
कलि में नर एहा घणा, मनि कपटी मुख मिट्ठ
जैन कवि मान
लूटि चोरि धनु लेत हो सो सबु देखत जाइ
जैन कवि मान
फणि विष सरिसो लोभ यहु मिति न सुपिनै रिज्झि
जैन कवि मान
ओ नम सिद्ध पढंत तुव आलस मकरि गंवार
जैन कवि मान