ओ नम सिद्ध पढंत तुव आलस मकरि गंवार।
अवरु कुविदद्या छांडि करि जपि जपि बारम्बार॥
ओं नम सिद्ध सरूप मित किण हियड़ै लिक्खै।
अवरु कुविद्या छंडि एहु तुव पढणहं सिक्खहि॥
बारंबार विचारि राति दिन सुरति न मिल्लै।
वह संबरु परहरिवि इक पइ उठि म चल्लै॥
जिम लहै सुख वछित जु कछु दुख दे हथंह नीसरै।
भणि मान जगतगुरु जुगति स्यों हो जपि जपि मत बीसरै॥