गोरउ सउ गात रसीली सी बात, सुहात मदन की छाक छकी है।

रूप की आगर प्रेम सुधाकर, रामति नागर लोकन की है।

नाहर लंक मयंद निसंक, चलइ गति कंकण छय्यल तकी है।

घुंघट की ओट में चोट करइ, ‘जसराज’ सनमुख आय धकी है॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर ,
  • संस्करण : प्रथम
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