कीं तांईं रोवै है बावळा।

के गयो तेरो

जको तेरो है। बो गयो कोनी

अमर बणबा खातर

माटी रो करज तो चुकाणो ही पड़ै।

के तू सोचै है कै

सांस लेवणियां सै जीवता है

धनजी नै देख!

लखापति है पण बेटो कोनी

खून पियोड़ो कै पूत कोनी होवै

अर जींकै है कोनी

बीं का के मरसी बावळा

जिंयां आज गयो हा तेरो बेटो

काल आपां भी चालस्यां

आणो-जाणो तो

दस्तूर है ईं दुनियां को।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : राधेश्याम अटल ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 12
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