म्हैं काच में देख रयौ हूं।

चैरौ घावां सूं भर्‌योड़ौ है।

किणरौ है औ?

म्हैं अेक पुकार सुण रैयौ हूं।

—म्हारै हियै में?

अथवा फगत हवा री चीस है? बीचली रात में फेर

गीत पसरतौ जावै है

आह...!

हरेक चीज जमती जावै है,

करड़ी हुवती जावै,

म्हैं कीं नीं जाण सकूं।

विदा...!

स्रोत
  • पोथी : अपरंच अक्टूबर-दिंसबर 2015 ,
  • सिरजक : चयरिल अनवर ,
  • संपादक : पारस अरोड़ा ,
  • प्रकाशक : अपरंच प्रकासण
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