अनुवाद : पारस अरोड़ा
टाबरपणै में
हर सवार म्हनै खुसी सूं भर जावती
पण हर सांझ म्हारी आंख्यां सारू नमी लावती।
अर अबै उमर वधियां पछै–
हरेक दिन वैम सूं सरू होवै है
पण उणरौ अंत–
कितरौ निरमळ–कितरौ पवित्र!