टाबरपणै में

हर सवार म्हनै खुसी सूं भर जावती

पण हर सांझ म्हारी आंख्यां सारू नमी लावती।

अर अबै उमर वधियां पछै–

हरेक दिन वैम सूं सरू होवै है

पण उणरौ अंत–

कितरौ निरमळ–कितरौ पवित्र!

स्रोत
  • पोथी : अपरंच ,
  • सिरजक : फ्रेडरिक होल्डरलिन ,
  • संपादक : गौतम अरोड़ा ,
  • प्रकाशक : अपरंच प्रकाशन, बासनी, जोधपुर ,
  • संस्करण : अक्टूबर-दिसम्बर
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