सुणी

उगबा लागगी अब

चांद भी

मिनखा री फसलां,

मौसम का मंसूबा

कोय चोखा

आकास बाणी सूं पड़ी

मालम

सूरज

गरी बरफ,

डरफी-डरफी बाल

जा बैठगी खाड्डा मांही

परकास ताईं

टांक हयौ सूली

अंधेरा को द्‌यो जा रियौ

राजपाट,

ठोकरां खाता पाणी

पील्यो जर को प्यालो,

घड़ी लटको टेम

गर पड़्यौ ऊंधो,

बादळां री हड़ताल

हाल ताईं चालू ही छ,

अतनी अदला-बदळी

बाद भी

टेलीवजन वाळा कै रया

हाल ताईं तो

कांईं भी बदळ्यौ

सब

राजी खुसी छ।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कृष्णा कुमारी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
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