बारै सांयत है।

घिर्‌यौ आवै है अेकलपणौ

रूंख नीचै सूं ऊपर तांई सीधा, चुप ऊभा है।

सांयत मूंडौ ढेर्‌योड़ी है,

इणनै चीरणवाळौ कोई कोनी।

हरेक चीज

बाट उडीकै, बाट उडीकै

आपरै अेकलपणै में इज

जिकौ गैलौ कर देवै, तोड़ देवै

जठा तांई के सगळौ-कीं टूट-फूट नीं जावै।

किणनै परवा है

के हवा जैरीली हुयगी है। सैतान हंस रैयौ है।

अेकलपणौ खतम को हुवै नीं। बाट उडीकूं हूं।

स्रोत
  • पोथी : अपरंच अक्टूबर-दिंसबर 2015 ,
  • सिरजक : चयरिल अनवर ,
  • संपादक : पारस अरोड़ा ,
  • प्रकाशक : अपरंच प्रकासण
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