कोई नहीं आंतरो गधेड़ा और ज्ञानी में,
जूतियां में दाळ बंट रही राजधानी में,
जीतवाळा मन की मटेट में ई फूलग्या,
हारबाळा लोग सारा चोक चाक भूलग्या,
धूळ खाणा लोग धोळै धूळ पटकाई रे,
ऊंठ्याड़ा की पातळ्यां में पांती पड़वाई रे
अरै कुड़सी पै थरप्या काग।
गोबर्या जाग सकै तो जाग।
नौकरी मली तो हेड थाणादार बणग्यो
हाथ में कुतेरो आयो और ज्यादा तणग्यो
वड़दी कै पाछै थारी सुणबाको कुण छै
वड़दी में गोबर्याजी लाख-लाख गुण छै
बेसरम लोग सरम नहिं आई रे,
मेड़ता में माई बेटा की जोड़ी मिलाई रे,
कस्यां अब बचै सत्यां को स्वा’ग
गोबर्या जाग सकै तो जाग।
भैरूजी का भाव आया ऑफिसर में बाबू में
धार देओ दारू की तो झट आज्या काबू में
फाइलां पै फाइलां रे फाइलां पै फाइलां
आलमार्यां लकड़ी की नोटांन की टाइलां
मांगखाणा लोग मांगबा दोड़ै
रिसबत बिना बाप नै नहिं छोड़ै,
भायला बचा लंगोटी भाग।
गोबर्या जाग सकै तो जाग।