म्हैं सुसक्यां भरूं

साच है

पण लोग ठिणक्या करै

म्हारै पै मुळक्या करै

दुखड़ा में सैंग धुधकारै है!

म्हैं जाणूं हूं—

खाडो कित्तो ऊंडो होवै

डूंगर कित्तो ऊंचो सोवै

म्हैं बिलख्यो-बिलख्यो फिरूं—

साच है।

पण ईसको कठै खमै?

मौज-मजै री जिनगाणी कठै रमै?

सब जाणै है—

म्हारै घरै अंधेरो क्यूं रैवै?

लोग म्हनै बिणजारो क्यूं कैवै?

म्हैं ओळख्यां करूं—(आंख्यां दीठ)

साच है।

मौन मिनख नै खटै कोनी—

अै टेम टेम री बातां!

स्रोत
  • पोथी : मरूवाणी ,
  • सिरजक : हरमन चौहान ,
  • संपादक : रावत सारस्वत ,
  • प्रकाशक : राजस्थान भासा प्रचार सभा, जयपुर ,
  • संस्करण : 11-12 (नवम्बर-दिसम्बर)
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