म्हैं सुसक्यां भरूं
ओ साच है
पण लोग ठिणक्या करै
म्हारै पै मुळक्या करै
दुखड़ा में सैंग धुधकारै है!
म्हैं जाणूं हूं—
खाडो कित्तो ऊंडो होवै
डूंगर कित्तो ऊंचो सोवै
म्हैं बिलख्यो-बिलख्यो फिरूं—
ओ साच है।
पण ईसको कठै खमै?
मौज-मजै री जिनगाणी कठै रमै?
सब जाणै है—
म्हारै घरै अंधेरो क्यूं रैवै?
लोग म्हनै बिणजारो क्यूं कैवै?
म्हैं ओळख्यां करूं—(आंख्यां दीठ)
ओ साच है।
मौन मिनख नै खटै कोनी—
अै टेम टेम री बातां!