धोरां री तपती धरती, मीठी लागै सुहाणी जी

मेहड़लै री वेळा में आ, मन नै लागै लुभाणी जी

उड़-उड़ धूळ गळै सूं लागै, मैं तो कृष्णा थांरी जी

खेत चौक नै बीज बोयदो, नहीं तो मैं कुंआरी जी

बोयो बीज बरस्यो सावण, निदाणां री रुत आई

रुत घणी चोखी लागै, मीठो तेजो स्वर सुआई

आभो आय मिलियो धरती सूं, धरती सेज बखाणी जी

धोरां री तपती धरती, मीठी लागै सुहाणी जी

होळै-होळै हिलोरां लेवै, खेत बाजरियां रो

खाटा-मीठा चोखा लागै, स्वाद काचरियां रो

बाजरी री रोटी माथै, ग्वांर फळी रो साग जी

खेजड़लै री ठंडी छाया, जीमण रो भाग जी

धरती रा हां टाबरिया, धरती म्हानै पिछाणो जी

मेहड़लै री वेळा में आ, मन नै लारै लुभाणी जी।

स्रोत
  • पोथी : जलम भोम ,
  • सिरजक : जगदीशसिंह सीसोदिया ‘स्नेही’ ,
  • संपादक : मूळचंद 'प्राणेश' ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा प्रचार प्रकाशन, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : 2-3, जून-दिसम्बर
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