भीतर की लाई सूं

भळसै छै आपूं आप

अर अश्यां ही

बळबळता डीळ पोसतां

बीतग्या जुग नरा

दुनिया का

ईं कूण्यां सूं ऊं कूण्यां तांई

जाता थकां

अबार भी न्हं भूलै कोय दन

म्हारा डागळा पै 'र

म्हं हैलो पाड़बो।

नतकै आवै छै

नुई आंच ले'र

मुळकाहट दै छै जागरण की

आंख्यां नै

अर सांझ ढल्यां पै

रमा ले छै जाणै धूणीं

डूंगर की आड़ में।

म्हूं सोचूं छूं अश्या में

पण न्हं पाऊं कोई जवाब कदी

के कुण की बाट जोहतां-जोहतां

जोगी होग्यो है सूरज बाबो?

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : अतुल कनक ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 23
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