च्यारूं ओड़ां छान थी, नीमड़ियां की छांव।

कोसां लैरां छूटग्यो, आज म्हारलो गांव॥

अेको थो जित जोर को, भाई को सो भाव।

कदे कोई राखतो, आपस मांय दुराव॥

सुख-दुख लेकर मौकळा, आता दिन अर रात।

मौसम बुगचो खोलतो, सी, गरमी, बरसात॥

इत तो छान’र झूंपड़ा, उत ठाकर को कोट।

सूरज उगतो रोज ही, लेकर बैंकी ओट॥

शहर जाण को हीवड़ै, रैतो गैरो चाव।

सेरां ल्याता राम रस, तेल मिरच बस पाव॥

सावण झूला झूलता, फागण रचता फाग।

गांव गळी की गौरड़ी, गाती जीवण राग॥

सांझी इज्जत राखता, सांझौ सै को मान।

सांझा सुख-दुख झेलता, सांझा छापर छान॥

मर ज्याणू मंजूर थो, राखण खातर बात।

बिन भाई की भाण कै, धाड़ी भरता भात॥

बचन दियोड़ा पाळता, देकर अपणू माथ।

जुध में जाता छोड़कर, हथळेवै को हाथ॥

गाढ़ी-गाढ़ी राबड़ी, पतळी पतळी छाछ।

पी कर सोता लोगड़ा, लेता सुख री सांस॥

तीज तिंवारा हीवड़ै, चढ़तो गैरो चाव।

कठै गया बै लोगड़ा, कठै गया बै भाव॥

नीं पणघट नीं देवरा, नीं पीपळ की छांव।

लोग बच्या नीं पैलड़ा, रह्यो सागी गांव॥

फागण में चंग बाजतो, मन में भरतो चाव।

गैरो आवै याद बो, आज म्हारलो गांव॥

भूरी-भूरी टीबड़ी, खेजड़ियां रा खेत।

दिन तो बीत्या मौकळा, गयो मन सूं हेत॥

के मांडू के छोड़द्यू, बाता तो अणवार।

सुरगथळी सै गांव नै, झुक झुक करूं जुहार॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : महावीर जोशी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक–18
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