हिम ढकिया बादळ सिसिर रा
उडता ज्यूं रेसा कपास रा,
पुसब सगळा झर गिया
अर जे नीं झर्या वै थोड़ाक है।
बांक दी लैरियां ठाडी
तिरै है ऊंचे गिगन में,
तौ धरती री मुधरी सांस
होवै है तपताळ
फकत सूरमां ही वस करै
विकराळ बाघ अर चीतां नै,
दूजा जंगळी सुअर डरा नीं सकै
इण वीरां नै।
अलूचै रा पुसब खिल्या
सामेळौ करै हिमाऊ बायरै रौ
जे माखियां ठर जाती
व्है जाती खतम, इचरज कांई?