ओ दिस थारी नहीं बटाऊं क्यूं तू भटका खावै।
अै आथूणो मारग तन्नै ऊगाणी दिस जाणो
नवल जोत बिखरा सूरज ज्यूं फैरूं पाछौ आणो।
अै सगळा बैहक्योड़ा बैहकै तूं मत आ बैहकावै।
ओ दिस थारी नहीं बटाऊ क्यूं तू भटका खावै।
इण स्वारथ साधणियों सागै तूं त्यागी ना जुड़सी।
अै भोगी भव बातां करसी थांरो मनड़ो मुड़सी।
अै सै दुखिया जलम-जलम रा दुख मारग बतळावै।
ओ दिस थारी नहीं बटाऊ क्यूं तू भटका खावै।
तूं सोनै रो बणज करणियो अै कबीर बोपारी।
तूं साचो अै कूड़ कबाड़ी माया कपट बिचारी।
कुपथ कुटेव भलणिया सगळा सुपथ नहीं दरसावै।
ओ दिस थारी नहीं बटाऊ क्यूं तू भटका खावै।
भौतिक सुख अभिलास मनां सूं रैण दिवस आराधै।
वैभव रूप जगत म माता परमारथ ना साधै।
पतहीणो रै कपट इसारै क्यूं पत आज गमावै।
अै दिस थारी नहीं बटाऊ क्यूं तूं भटका खावै है।