संका अर नेह

दोनूं साथै-साथै इज

हिवड़ै में पनपै अर पसरै

आज इज ठा पड़ी।

संका रै अंधारै में आप गमग्या

अर म्हैं डर-भौ सूं थरथरायगी

सरीर में ज्यूं कीड़ियां चालण लागी।

रे कंत!

इण अंधारै नै चीर'नै अबै थे जावौ

म्हारै मनोबळ री हेठी नीं करौ

इण संका माथै

नेह नै जीतण दौ।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : श्रीमती सरोज कछवाह ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : जनवरी 1987
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