आंगण मं चिड़ियां चहकैली,

तुळसी रो संयम महकैलो,

थारी परछाई रै बिन यो

सारो घर जियां दहकैलो,

उजियाळो बेमन गावैलो

अंधारो घर में छावैलो,

ड्योढ़ी गुमसुम हो जावैली

आंगणियो आंसू ल्यावैलो,

थारै घर सूं कद आवैली

म्हारै आंगण कद लौटैगी

अगर हो सकै तो संदेसो

हवा-हाथ संग भिजवा दीजै।

आंगण, देळी, दरवाजा स्सै

कद सूं स्वागत में बैठ्या है,

थारै मंदर रा कान्हां जी

गुस्सै सूं भर कर अैंठ्या है,

पूजा तुणक-तुणक जा री है

बाती सगळां सूं न्यारी है,

सारा भजन अधूरा लागै

बंशी बेसुध सी गा री है

बिण बातां सूं दिन ढळर्‌यो है

सूरज मर्‌यो-मर्‌यो चलर्‌यो है

अगर हो सकै तो संदेसो—

संझ्या साथै भिजवा दीजै॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मधुकर गौड़ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-28
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