ईंट अर भाटां सूं

चिण सकै घर

छिपा सकै माथो

मिनख नै लूट’र जी सकै

अर

अन्न नै रांध’र खा सकै

कांईं इणीं’ज लायकी रै भरोसै

मिनख बाजै है

सभ्य मिनख?

म्हारी मरु-भासा में

अेक सबद कोनी

जिणरो अरथ होवै—

‘सभ्य मिनख’।

हैरान हूं म्हूं

गौर सूं गोखूं हूं म्हूं

‘सभ्य-मिनख, जिसो सबद

क्यूं कोनी

म्हारी इण मीठी भासा में।

इणी टणकी भासा में।

हैरान हूं म्हूं

सबदां रै इण अथाग समदर में

जिणमें

ना-कुछ पगरखी सारू

पनरै-पनरै सबद है

‘सभ्य-मिनख’ जिसो सबद

क्यूं कोनी?

भावां सूं भीनी है

मुधरी मरु-भासा

रस अर रीझ सूं लैय’र

रीस अर खीज तक

अेक-अेक भाव री

न्यारी-न्यारी भंगिमा सारू

कितरा-कितरा सबद है

झीणै सी’क आंतरा नै नापता।

चाण-चक आवै है विचार

जाणै आभै में चमकी होवै बीजळी

अेक

अणमावती पळपळाट चमकै है

दिसो-दिस।

सभ्य रै सिवाय

मिनख री कोई कल्पना कोनी

म्हारै इण मुलक में

म्हारा संस्कारा में

म्हारै जन-जीवण में।

इण सारू

‘सभ्य मिनख’ कैवण री

जरूत को लखीजै नी

म्हानै

म्हारी मरु-भासा में।

मिनख कैवणो घणो

मिनख नै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : रामेश्वरदयाल श्रीमाली ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक–18
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