ऐकलो घर

अश्यो जश्यां

नदी की लीर पै होतां सतां भी

अभिषेक की बाट जोहलो होवै

कोई शिवलिंग।

घर में घुसतां ही

घेर ले छै बळबळतो सन्नाटो

बारणां पै जुड्‌यो ताळो खोलतां ही

ताळो जुड़ ज्यावै छै अचाणचक

जाणै हिवड़ा की मैड़ी पै।

म्हूं अनमण्यो सो

कदी पलटूं छूं कोई पोथी का पाना,

कदी बदलूं छूं टी.वी. का चैनल,

कदी लगा द्यूं छूँ कैसेट प्लेअर पै

कोई गज़ल

अर कदी अश्यां ही

बतियाबा लाग ज्याऊं छूं टेलीफोन पै।

बगत काटबो चाहूं छूं म्हूं

पण बगत म्हंई काटबा दौड़े छै

लाख जतन कर्‌यां पै भी

सैळी न्हं पड़ै या आंच

म्हूं

कागज पै रींगटा खींचता-खींचतां

बूंद-बूंद पिघलूं छूं

स्याही की लेरां

अर लोगदणी क्है छै (के)

म्हूं कविता गांडू छूं।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : अतुल कनक ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 23
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