अगर चावो–
चौमासां में चारूं महीनां
रिमझिम-रिमझिम मेह बरसै
खेत रेत में नहरां धोरां
गांव-शहर; मझरा-ढाणी
कोनी तरसै बिन पाणी
तो
हरियाळी नै मत चूंटो
रूंख लगाओ; रूंख बधाओ
हरियो भरियो देस बणाओ
अगर चावो
घर-गुवाड़ी को रूप निखरै
गळी-गळी सूं मिटै अंधारो
आंगण-आंगण में रेवै खुसहाली
उजाला रो वंश बधावै
ओढ़ी पैरी लिछमी घरवाळी
तो
घणी किलकारियां मत गुंजावो
बढती भीड़ पै लगाम लगाओ
अेक आंगण में
पालणा दो ईज बार बंधाओ
अगर चावो–
अमन चैन री बंसरी बाजै
चंदण-सी महकै फुलवारी
सावण-फागण री रुत में
ढोल-ढमाका मृदंग-चंग पै
साथ निभावै कामेतण प्यारी
अर
घुळै रंग हेत रा
उडै प्रीत री गुलाल
तो
लड़कियां नै भणबा सूं मत रोको
महिला-शिक्षा रो महत्व
समझौ अर समझावौ
पढ़ी लिखी नारी नै
खुसहाली रो आधार बणाओ
अगर चावो–
चेरापूंजी रो जळ
रेतीला धोरां री तिरस बुझावै
हिमालय पर्वत रो कंकर भी
सेतूबन्ध रामेश्वरम् में
रेतीलो शंकर बण पूजावै
तो
फूट-फजीता फिरकापरस्ती मत फैलाओ
भासा प्रान्त रा झगड़ा नै छोडो
सगळा भारत वासी बण जाओ।