आंख खोली जद सूं
सोना कै पालणै में झूलण मिल्यो
कोई भी चीज एक मांगी दस मिली
जिन्दगी भर जो चायो बो ही हाजिर
सारै दिन नौकर-चाकरां की हाजरी
चारुंमेर ठाठ ही ठाठ
अक्ल अर समझदारी कठै सूं आती
ज्यां-ज्यां उमर बढी
बाळणजोगो सुभाव बिगड़तो गयो
अब तो इंसान नै इंसान
समझणै की ल्याकत भी
आई-गयी होगी।
जे बचपण में कड़ी मेहनत करी होती
इंसान नै इंसान समझ्यो होतो
पीसां की कहाणी जाणी होती
तो आज कूट-कूट कर समझदारी आती।
पैंड-पैंड पर अकल मुसकाती
हाथा में हूनर होतो
अर हर चीज में उस्तादी होती।