अरै रावण! दही का जावण!

तू कांई अकरम कर्‌या छै,

थारै जिस्या तो म्हारा देस में

असंख्य भर्‌या छै।

थारो चरित छेकलांहाळा कै घाट छै।

बावळा, म्हां कै इस्या छप्पन सौ साठ छै।

तू तो कर्‌यौ अेक सीता को हरण,

अठै तो नितकी होय छै

लाखूं सीता-सावत्र्यां को मरण।

तू तो मर’र धरती सूं न्हाटगो,

पण थारा पेट हाळा घड़ा को पदारथ

म्हां का देस का रावणां में बांटगो।

तू तो छो फकत जरा सो जावण

म्हां की पुन्न धरा पर

जम गया रावण ही रावण।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : बिहारी शरण पारीक ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-28
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