रंग विहूणौ

गांव व्हैग्यौ थारौ-म्हारौ

अपणायत री जाजम ढळती

वै कोटड़ियां हेत-हेज री

ऊंडी बातां

री झंपड़ियां

नाडी-सरवर पाळां सारी

रंग विहूणी।

रंग विहूणौ आभौ सारौ

अर धरती

कोरी चित्कारां गूंजै बस

आंगण-आंगण

मिनख-मिनख रै नैणां पाणी

झरतौ रैवै जीव-जिनावर

आगोरां में तड़फा तोडै

रातां जांण पिसाची

दिनड़ा पोचा

आखी जगती में अंधारौ व्हैग्यौ।

वळोवळी में दीसै इक सन्नाटो

रिनरोही सा लागै सगळा आंगण

कुण किण नै नीं बतळावै

मीठो बोलै मांय-मांय आदम

घुटतौ जावै मरतौ जावै

पण, नी लावै बात मांयली

होठां ऊपर।

सूरज ऊगौ

पण, बादळियां घेरो दीनौ

उण री किरणां

गांव-गोरवैं पूगै कींकर

दिन लागै बुझ्यौड़ो सो

रंग विहूणौ

चाँद उतरियौ धरती माथै

पण, अंधारौ घटाटोप सूं जूझै

कीकर बा’रे निकळै?

रंग विहूणी

ओरण-आभा, हरियल गाभा

फीको पड़ग्यौ

रंग बोरड़ी खेजड़ियां रौ

ऊंडी पसराई उदियासी

थळियां-धोरां

सूना-सूना तळा, हौदियां-खाळां

जिण दिस देखां

वीं दिस बस मोटा निसकारा

रंग नहीं, बस बेरंग लागै सारा।

जाणै—

आदमजात धरा सूं उठगी

सगळी जीयाजूंण

मिनखरी गळगी

दाझी कंवळी देह

दुखां रै ताळां

बेरंग व्हैगी जगती

सूनौपण पसरायौ।

स्रोत
  • पोथी : इण धरती ऊजळ आंगण ,
  • सिरजक : महेंद्रसिंह छायण ,
  • प्रकाशक : रॉयल पब्लिकेशन
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