फुर-फुर उडती गिगन फिरूंला चिड़ी बण चुग लेस्यू चूंण।

भूल चूक नै म्हानै विधाता फेर दीज्यौ मिनखा जूण।

नान्यौ हुयां हरख सूं निरखै, लेय धमीड़ा होयां धीव।

बरत दुभांता घणो दिखावै पोचीवाड़ौ परणी पीव।

बेटी नै दाकल डरपावै लाड लडावै सुत दे जीव।

फोरो खावण पैरण बेट्यां घणो घलावै बेटा घीव।

बेटी दुखी सासरै बैठी बेटा होसी हेज विहूंण।

भूल-चूक नै म्हंनै विधाता फेर दीज्यौ मिनखा जूंण॥

भणण जावण सोरको बाळक सांसो होमवरक अठपौर।

लदियौ भार किताबां काप्यां खांधो कमर हुया कमजौर।

असली ग्यांन पड़ियौ पांनै ग्यांन किताबी नवो नकौर।

खुली हवा में दिन खेलण रा बन्द होयगौ कमरै छौर।

चक चसमो ‘जीटीवी’ देखै आछा संस्कारा अपसूंण।

भूल-चूक नै म्हंनै विधाता फेर दीज्यौ मिनखा जूंण॥

‘टाइमपास’ करै पौसाळां लगन नहीं राखै लवलेस।

कुबद अबै सीखै बणियोड़ा करण धार अै भारत देस।

बणग्यौ जबर बौपार भणाई होडां होडी लगी हमेस।

नहीं नौकरी पढियां खातर बेरूजगारी बदी बिसेस।

मजदूरी करता सरमावै खोड़ खुड़ावै गत आथूंण।

भूल-चूक नै म्हंनै विधाता फेर दीज्यौ मिनखा जूंण॥

छोरा ब्याव सगाई सारू बिकै डांगरा पसुवां जेम।

माथै बूक मांडली माईत आंरौ पेट भरीजै केम।

दरजै अव्वल दायजो मांगै सोना गहणो लेवण नेम।

भांत-भांत रा कोल करावै मिटै नहीं बिन देख्यां वेम।

पीळा हाथ होवण मुसकल निरधन री बेट्यां दुख दूण।

भूल-चूक नै म्हंनै विधाता फेर दीजौ मिनखा जूंण॥

नहीं सुहावै सासू सुसरा बीनणिया इसड़ी बदनीत।

नणद-भौजाई राड़ मचावै देवर-भाभी रही प्रीत।

जेठाणी रौ करै ईसको देराणी स्वारथवस सीत।

घर खेती रौ काम बीगड़ै गावै आप-आप रा गीत।

नारी री नारी छै दुसमण करतूतां में कमती कूण।

भूल-चूक नै म्हंनै विधाता फेर दीज्यौ मिनखा जूंण॥

बीनणियां सिणगार सांतरौ सजी-धजी आभा दे अंग।

फबता वेस फूटरौ गहणौ कळी-कळी रौ छाजै रंग।

बरस बीततां बगत लागै ढील पड़ै जोबनियै ढंग।

कोकळ बधगी कळह करावै तर-तर तन सूखै व्है तंग।

सळ पड़िया तन छाय बुढापौ बण डोकरियां पकड़ै खूंण।

भूल-चूक नै म्हंनै विधाता फेर दीज्यौ मिनखा जूंण॥

जोबन पाय मिनख जोरावर बोलै गरबी कड़वा बोल।

खंवा कुदातौ खाख पिदातौ मोद करतौ छाती खोल।

ऊंधा काम करण में आगै कुसंगतां रा काळा कोल।

जोबन गयां बूढापै झिलियो सरतण ढीला पड़ग्या मोल।

दियौ जबाब कान दंत आंख्यां कुड़ी कमर घाली तन घूण।

भूल-चूक नै म्हनै विधाता फेर दीज्यौ मिनखा जूंण॥

धन कमावतौ धाप धारै हिळा चोळजोसां पग हाथ।

आपधापी पखापरवी में लोभी दौड़ रैयौ दिनरात।

‘मारूती’ में फिरै माब्हतो बंगलां री कहणी के बात।

मील फैक्ट्री थाट बाट बहु अेक नहीं चालै संघात।

अड़ी मांय आडा नीं आवै धायोड़ा ले माथौ धूंण।

भूल-चूक नै म्हंनै विधाता फेर दीज्यौ मिनखा जूंण॥

गरज काज दोस्तीयां घालै करबा में चूरै नीं घात।

खुद रौ पेट भरण रै खातर औरां पेट लगावै लात।

रगत चूंस निरबळ-दुरबळ रौ हरख हतायां जोड़ै हाथ।

करणी-कथणी फरक अणूंतो इसड़ा करै देस री खात।

खावै जिकाई ठांव नै फोड़ै? बणजाय हरामी लूंण।

भूल-चूक नै म्हंनै विधाता फेर दीज्यौ मिनखा जूंण॥

गायां री अद नहीं रही धर भूल गया आंरौ औसांण।

भूखी तिरसी फिरै भटकती धणियां नीत बिगाड़ी जांण।

बैलां रौ करसण तज दीनौ परबस हुवा टैक्ट्रर पांण।

जैहर राळ अन घण उपजावै खूट गयौ ससवादो खांण।

तंतहीण मतहीण हवा नर अबलां रा पटकावै भ्रूंण।

भूल-चूक नै म्हंनै विधाता फेर दीज्यौ मिनखा जूंण॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : लक्ष्मणदान कविया ‘काव्य शास्त्री’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन, पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-19
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