म्हारी खिड़की रै कनै

बैवै अेक नदी

रोज दिनूंगै सूं

दस बज्या ताईं

जद म्हैं सोवतो रैवूं

तो मकाना रा दरवाजा नै

काट काट’र

बैवै अेक नदी

म्हनै बेरो है

म्हैं कत्तो जाणू नदी नै

खिड़की रै सारे बैठ’र

री लहरां रै अेक-अेक दरद नै

खुद झेलूं

म्हारी नींद रो अेक-अेक छिण

नदी सूं जुड़्योड़ो है।

नदी रै बैवण री आवाज

तोड़ देवै म्हारी खिड़की रा सींखचा नै

मेरे मांय कीं टूटै

मेरो निजूपण।

नदी में टूट-टूट’र बिखरै

अर मैं ईं अणजाण नदी सूं

खुद रो सम्बन्ध जोड़ लेवूं

खिड़की रै कनै बैठ्यो-बैठ्यो।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कृष्णबिहारी सहल ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 23
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