पपैयो कै पुरखनै, रट रसना सूं पीव।
रचियां-पचियां जीव में, बचसी माया जीव॥
पपैयो विरहण कैवै, पी-पी पी-पी रट्ट।
तन मन धरियो पीव में, आय मिळैला भट्ट॥
पपैयो पी-पी कैवै, पी नैड़ो नहीं, दूर।
नैण वैण पी रस रस्या, हाजर खड़ो हजूर॥
पपैयो पिव-पिव रटै, जीव न पीव रटै।
पाप ताप पीढ्यां तणा, रटियां जीव कटै॥
चेती चिंता चौगणी, साय न अेक गुणी।
तन-मन-धन निगुणीनरां, तै बिन कुण धणी॥
थां देख्यां औगण करूं, फस माया रै जाळ।
कुण वगसै ‘वल्लभ’ बिना, तंतहीण तिरकाळ॥