पपैयो कै पुरखनै, रट रसना सूं पीव।

रचियां-पचियां जीव में, बचसी माया जीव॥

पपैयो विरहण कैवै, पी-पी पी-पी रट्ट।

तन मन धरियो पीव में, आय मिळैला भट्ट॥

पपैयो पी-पी कैवै, पी नैड़ो नहीं, दूर।

नैण वैण पी रस रस्या, हाजर खड़ो हजूर॥

पपैयो पिव-पिव रटै, जीव पीव रटै।

पाप ताप पीढ्यां तणा, रटियां जीव कटै॥

चेती चिंता चौगणी, साय अेक गुणी।

तन-मन-धन निगुणीनरां, तै बिन कुण धणी॥

थां देख्यां औगण करूं, फस माया रै जाळ।

कुण वगसै ‘वल्लभ’ बिना, तंतहीण तिरकाळ॥

स्रोत
  • पोथी : जलम भोम ,
  • सिरजक : मुरलीधर व्यास ‘राजस्थानी’ ,
  • संपादक : मूळचंद 'प्राणेश' ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा प्रचार प्रकाशन, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : 2-3, जून-दिसम्बर
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