घर की देहळ पै
सूरज ई, ऊभो देख’र
अेकसमचै
ताण ली बाफण्यां
रात-भर सूत कातती
डोकरी नै,
बां बी कद तांई देखती
आंधी हो’र
तारा कै
छिपतां खेलता
बादळ ई, जद
रात की बांथ भर’र
सोयो सूरज ई
लागग्यो होवै गेलै
धुंध का गाबा
प्हैर’र।
बादळा ई दकालती
ओळमो देगी, थारी ज्यात ई
तसाया मरती धरणी
तू बी
भरा-भर दुपहरी मं
तपबो सीख
रीती कोय न्हं, ई बगत बी
समदर की मनवार
जा! भर ला छागळ
चळू करा दे, दो च्यार
बिलखता जीवां ई
र्बाड़ी धरती पै, बवा दे
अमरत को धारो
देहळ पै ऊभो सूरज
दखार्यो छै गैलो
खारा समदर को।