कदै तो आखर

ढब्बू ज्यूं लखावै

अर कदै-तीखा गड्डा बण जावै।

म्हैं ढब्बू अर गड्डा मांयसू

घड़णा चाऊं

नुवां अैड़ा आखर

जका झौळ सूं उबर'र

आपरै औज सूं संवरै

घूमर घालै

म्हारै मन आंगण

अर थारै भी

जका भागीदार हुवै

धौवण में आत्मा रो कळमस।

जका हिमायती हुवै

थरपण में

मानखै अर मिनख रो

गरबीलो मस्तक

म्हैं लागोड़ो हूं

सौधण में—

नुवां अैड़ा आखर।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : वासु आचार्य ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-28
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