वासु आचार्य
चावा कवि। 'सीर रो घर' कविता संग्रै पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार।
चावा कवि। 'सीर रो घर' कविता संग्रै पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार।
अेक तारो टूट्ग्यो
अेक पंखेरू
चालतोई चाल
डाळा न्हाख्यां कीं नीं बंटै
देवता
नदी, नदी ही नीं है
फरक थारै अर म्हारै बिचाळै
हाउड़ौ—हाऊड़ा ई हाऊड़ा
हुवणै रो अैसास
जका बखत नै सैसी
जातराःपौती री मुळक सूं बिरम तांइ
जीवायग्यो बादळ
कठै ही नीं हुई नूवीं बात
कीं तौ बोल-म्हारां बीरा
खटारा साइकल रै सायरै
कीड़ी
क्यूं लाचार है आदमी?
म्हारो मन
नुवां आखर
पा’ड़, जड़ नी है
पेड़