सै जग रा भरतार

आज म्हैं आयो थांरै द्वार

थाळी बजी जद मायड़ री

हरखी कितरी देह?

कितरै हेत-हुलास-हास सूं

निरख ढोलियो नेह।

माता दियो दूध रै सागै

कितरो हेत दुलार।

सै जग रा भरतार

आज म्हैं आयो थांरै द्वार।

साथ्यां साथै रच्यो धूड़ में

सोनै रो संसार।

सै जग रा भरतार

आज म्हैं आयो थारै द्वार।

मोती जिसड़ा पीलू चुगनैं

जाळां हेठै खेल।

पकड़ कमीज चलाई छुक-छुक

खूब जोर सूं रेल।

हिरण चौकड़ी भरता व्है ज्यूं

रम्यो खेत रै पार।

सै जग रा भरतार

आज म्हैं आयो थारै द्वार।

सपन परी रै साथै

सपनां में उडियो आकास।

कितरो है आणंद

कल्पना रो कितरो विस्वास।

कितरा महल माळिया छिणिया

कितरा गूंथ्या तार।

सै जग रा भरतार

आज म्है आयो थारै द्वार।

जद लग रंग रगत घणेरो

हो उछाह-अनुराग।

रोज खेलतो हो लाली री

मधुर-गंध सूं फाग।

बीत गई दो दिन में

जीवन री रतन बहार।

सै जग रा भरतार

आज म्हैं आयो थांरै द्वार।

चांदी री थाळी ऊपर

ज्यूं सोना री रेख।

कितरा गाया गीत प्रीत रा

गाल गुलाबी देख।

हिरणांखी नै धणै हेत सूं

देखी बारम्बार।

सै जग रा भरतार

आज म्हैं आयो थांरै द्वार।

गूंथ्या कितरा जाळ आज लग

गूंथ्या कितरा फन्द।

दुनिया में बाकी नी राख्यो

म्हैं कोई छल-छन्द।

कांई हाथ आयो म्हारै

छल-छन्दों रो सार।

सै जग रा भरतार

आज म्हैं आयो थारै द्बार।

अब बसन्त बीत्यो, आयो है

उलळ उनाळो खूब।

बिखरी फूल-पांखड़्यां

सूखी है जीवण री दूब।

काल चक्र में भमतो-भमतो

गयो जमारो हार।

सै जग रा भरतार

आज म्हैं आयो थांरै द्वार।

अब तो चूस्योड़ो आंबो है

नैं सूखोड़ो फूल।

अरपित है थांनै मन भमतो

अधर-भंवर रै झूल।

भळै भमावो भंवर-जाळ में

भळै उतारो पार।

सै जग रा भरतार

आज म्हैं आयो थांरै द्वार।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : नैनमल जैन ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 15
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