मिनखपणो मिनखां रो घटग्यो,

आपसरी से घटग्यो प्यार।

एक दूजै रो विश्वास घट्यो है,

ब्याह-शादी बणग्यो ब्यौपार॥

बूढ़ा-बडेरां री कद्र घटी है,

काण-कायदो भूल्या मोट्यार।

दिन-दिन फैशन री चाल बदलगी,

शिक्षा रो होग्यो बंटाधार॥

नौ सौ चौदह छोरियां पर,

छोरा है पूरा एक हजार।

जनगणना रो यो नयो आंकडो,

ले डूबसी म्हानै मझधार॥

हाथ-हाथ नै खावण लाग्यो,

भ्रूण हत्या भी होवण लगी।

पैदा होवणै सूं पहलां ही,

खुद मां ही कूख मिटावण लागी॥

ईमानदार बैठ्‌या है भूखा,

बेईमानां का है ठाठ अठै।

सांच कहवणियां फिरै भटकता,

झूठा है तीन सौ साठ अठै॥

बेरोजगार दर-दर भटकै है,

डिग्री डिप्लोमा होग्या बेकार।

काम हाथ को आवै कोनी,

इणकी कैंया पड़सी पार॥

भ्रष्टाचार को जोर घणो है,

घोटालां पर घोटालां हौवण लाग्या।

धन की भूख धर्म को घाटो,

पापी मौज उडावण लाग्या॥

पाप खड़्यो है म्हारै सिराहणै,

खड़्यो-खड़्यो बो मुळकै है।

धर्म पड़्यो है काळ कोठड़ी,

आख्यां में आंसू ढुळकै है॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : सन्तोष कुमार जागिड ‘पंछी’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-34
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