जिंदगी रै कटघरै में तणी मौत री कनात

बैठ्या खूनी गिरझड़ा लगायां कोझी घात।

काळी दरारां में तड़फड़ै ऊजळ परभात

सूळी चढै बापड़ा इसा ठा नहीं किण बात।

खिण लागै आंखड़ी रै हुवै गैरो घात

इण हादसां सूं कद मिलसी नजात?

जद-जद भी उठै कोई भर्‌यो-पूरो हाथ

ठा नहीं क्यूं आडी आवै बा टूटळी लात।

धन है! धन है! पण मिनख री जात

जीवै है सै नै सारी लात कसाघात।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : सवाईसिंह शेखावत ,
  • संपादक : माणक तिवारी ‘बंधु’ ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : अप्रेल, अंक - 02
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