म्हारा घर रा आंगणा मँ
खड़ो नीम रो रूंखड़ो
म्हनै चोखो लागै छै
ई री ठंडी छांव
म्हनै देवे छै
तावड़ा सूं निजात
जी मँ बैठ'र
मांडू हूं म्हूं
नुवी-नुवीं कवितावां।
खदी-खदी
ई रो चुप रहबो
अर खदी-खदी
ई रो बाल सूं हाळबो
म्हनै करै छै
सोचबा-विचारबा रै लैखे प्रेरित।
ये रूंखड़ा ई
म्हानै पढ़ावै छै
सदाचार रो पाठ
सिखावै छै
पुरूषार्थ रो महत्व
देवै छै
परमार्थ रो ज्ञान
भलै छै
बीमार होबा पे
दवा दारू जड़ी-बूंट्यां
ईण सूं ई।
आं रूखड़ा रे नीचै ई
भगवान राम ने
करयौ छो
आपणो वनवास पूरो
अ'र वाल्मीकि नै
लिख दी छी रामायण
बुद्ध नै भी पायो छो सास्वत ज्ञान
तळै ई के ई
अ 'र अमृता देवी ने तो
ई रूखड़ा री रक्षा रै लैखै
ज्यान ई दे दी छी
अ'र म्हासै खैगी छी
रूंखड़ा मत काटो
ये बी मनख्या री नाईं
जीवधारी छै
निर्जीव कोई'न!
ये तो धरती रो सिणगार छै
ये है तो संसार छै
जीवता ई जे मलज्या
वा सुरग छै ई के तळै
अ'र से नहं रहांगा तो
या धरती
बण ज्यागी छोछो नरक।
भगवान रा अवतार छै
ये रूखड़ा
म्हारा आंगणा को ओ नीमड़ो
म्हानै लागै छै घणौ चोखो
ई री ठंडी छाव में
बैठ'र म्हूं मांडू छू
कवितावां नत नुवी।