तू थांरी करणी रा खुद ही
मत पीटै नित ढोल।
करम अकारथ कद जावै
धरती रै कण-कण बोलै,
तपसी री चिर-मून पड़्यै
भरमां रा पड़दा खोलै,
लाग्यो रै तू थारै किरतब
जण खुद करसी मोल!
बडबोलो बण, बोल बावळा
के दुनिया सूं पासी?
थारै जस री भूख सांच में
बैठी भरम रळासी,
भरै क’णा खाली मनस्या सूं
आ सुपना री खोळ!
निसचै निज हिम्मत परवाणै
आगै बधतो जावै,
संका निज् रै मारग री
जग-भर सूं साख भरावै,
कुण सौ झाल्यौ हाथ, देखले
एक’र आंख्यां खोल!