आंख री बैं’ती नदी में

आज मन क्यूं डोलर्‌यो है।

चाहतां री सभा जुड़ री

प्राण बंधन खोलर्‌यो है।

सांस रै आलिंगनां में

महक रो विस्तार होर्‌यो

दूरियां री उमर घट री

नेह रो संचार होर्‌यो

लहरियां मनुहार कर री

‘विजन’ क्यूं-क्यूं बोलर्‌यो है।

आज मन क्यूं डोलर्‌यो है॥

रूप री मूरत कनै

क्यूं लजा कर देख री है,

उण रै होंठां पर मुळक

मन रीझां कर खेलरी है,

चुप्पियां में पवन आय’र

नवल-स्वर, मद घोळर्‌यो है।

प्राण बन्धन खोलर्‌यो है॥

स्रस्टि, सिरजन साथ लेय'र

श्लोक नव-निरमाण कर री

चेतना रै बदन पर

मुगधता अविराम झर री

सपन सूं बाहर निकळ कर

समय साचो तौलर्‌या है।

आज मन क्यूं डोलर्‌यो है।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मधुकर गौड़ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-28
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