मंहगाई भाई मंहगाई

खाणनै रोटी नीं है

नीं है ओढ़ण नै रजाई

नीचै ही सोणो पड़ै

चारपाई तो दूर, नीं है चटाई

मंहगाई भाई मंहगाई।

पापी पेट है जकै रै खातर

हुवै भाईयां मांय लड़ाई

आयो ईसो घोर कळजुग

मरणै री आफत आई

खायगी मंहगाई

मंहगाई मंहगाई।

सेव, आम, अमरूद देख’र

कोठी, बंगला, हवेली देख’र

घणो ही जी ललचाई

रीपियै रो है खरचो

आठ आना री कमाई

मारै मंहगाई

मंहगाई मंहगाई।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : पृथ्वीराज चौहान ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-28
जुड़्योड़ा विसै