ल्यो करल्यां मन री बात।

कुण बैरी कद कर जावैलो आपां ऊपर घात॥

थारी म्हारी करबा सूं तो, अकेलोपण चोखो छै।

कुण पै हेत जतावां जादा, पग-पग पै धोखो छै॥

ठौर-ठौर छै मीठी बाणी, भीतर कड़वी बात।

स्वारथ पै मखमल बिछ जावै, पाछै व्है ही टाट॥

कुण को हिवड़ो दीख रियो छै, नद्‌यां को सो पाट।

ल्यो करल्यां मन री बात॥

बगत पड़्यां काका जी खेवै, पाछै देवै गाळ।

हरख्यां देख थंपै फैलावै, माकड़ियां रा जाळ॥

अस्या मिनख सूं दूरां रीज्यो, चालै देवड़ियां चाल।

दूध पिवातां जहर उगळ दे, इस्या सरप मत पाळ॥

संभळ यार मनचंदा बैगो, खा जावैगो मात।

ल्यो करल्यां मन री बात॥

दन दूणी अरु रात चौगणी, बधरी छै महंगाई।

दुसमण नेड़ै बैठ आपणै खोद रह्या छै खाई॥

गांव-गांव अर ढ़ाणी-ढ़ाणी, चालबाज तगड़ी छै।

गहणै मलरी ज्याग जमीना, बची शेष पगड़ी छै।

घर में अेक कमाबा वाळो, खाबा वाळा सात।

ल्यो करल्यां मन री बात॥

लोगां की अब रीत बगड़गी, मनख्यां की या प्रीत बगड़गी।

दन बगड़ग्यो रात बगड़गी, सहळी सगळी जात बगड़गी॥

कुण कै बांधा राखी तागो, कुण कै सत की डोर।

धोखो-मोको कद हो जावै, चाल रियो छै दौर॥

मिनख्यां को सत सारो झड़ग्यो, ज्यूं पतझड़ रा पात।

ल्यो करल्यां मन री बात॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : बद्रीलाल मेहरादित्य ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-27
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