धरती रै जाग्या पैलां

बोलण लाग्या

पांख पंखेरू

लागै पार नीं पड़ैली

हीणै मन सूं जींयां

घणा चतर है

अठै रा लोग

तो घणा माड़ा है

अठै रा थोग

बै थानै देखै

समझै अर

थानै तोलै

पण थे सावचेत हुवो

क्यूंकै लागै

पार नीं पड़ैली

हीणै मन सूं जींयां

कुण तप्यो है

आं सिरमोर

मिंदर अर देवरां तांई

कुण हंसायो

आपरै पसीना सूं

ईं बेकळू माटी नै

कुण साम्ही

अै यात्रा अर मारग

तो किण नै दाय आई

नुवीं कूंपळ

नुवीं खेती

इण वास्तै

थांम रै

आं रूळपट मिनखां री

कुबत नै

पळट ईं मुलक रै

चैरै नै

क्यूंकै पार नीं पड़ैली

हीणै मन सूं जींयां

निरख

कादै रै मांय धंसतै

कमलां री मुळक नै

रपटण में मोजां मारतै

मानखै नै

अब घड़ीजै

नुवीं मूरत

पुड़तां में दाब्यो जावै

आखर

पण नाप रै

फितरत रा लाम्बा हाथ

तोड़ रै

जमीं रा अै सींग

क्यूंकै म्हनै लागै

हीणै मन सूं जींयां

पार नीं पड़ैली

नीं पड़ैली।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : गोरधन सिंह शेखावत ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 13
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