जोवो तो सरी

सामली डूंगरी माथै ऊभा

बावनिया

म्हारै तांईं पूठ कर

गटगटा पीवै है

सगळो आकास!

अर म्हैं दरड़ में

ठूंठ ज्यूं अडिग, हाथ ऊंचाया

सूखती जीभ सूं लगाया करां

तिरस अर पांणी रो गुणा-भाग

म्हारी निजरां फगत

बणरी गटागट री

मालणी जाणै।

जोवो तो सरी

आभै रा सगळा चिलकता तारा

उण रै मुगट में सज्या है!

सीतळ चांद री चांदणी

पिंड माथै अणूती थेथड़

वा फूटी आंख्यां रै

डोळां री जाग्यां

सूरज नै बिठा दियो है,

अर म्हैं उणारी

सूरजमुखी आंख्यां री बळत में

उघाड़ै डील, पगै उभराणा

तर बधती चीसां सूं

लगाया करां

तावड़ै-छियां री जोड़ बाकी

म्हारी उसासां फगत

उणरी पिंडवाळी चांदणी री

बारखड़ी जाणै!

जोवो तो सरी–

म्हैं कठै अर वो कठै?

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : पुरुषोत्तम छंगाणी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 13
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