लैरियै रो पल्लो म्हारो उड-उड जाय

परवा सुहाणी, म्हारो जीवड़ो जळाय,

लागै बाईसा थांरो बीरो घर आय।

लैरियै रो पल्लो म्हारो उड-उड जाय।

उठै पैली सासूजी, ली मैं चाकी झोय

गोडै उपर गीगलो बो गहरी नींदा सोय

मंडीरी ऊपर कागलो, वो करै कांय-कांय

लागै बाईसा थांरो बीरो घर आय।

काम करती को म्हारो मनड़ो कोनी लागै

मैं तो समझाऊं, बो तो ऊंळो सुंळो भागै

म्हांनै कोनी बेरो— कुण आवै कुण जाय

लागै बाईसा थांरो बीरो घर आय।

काम नै जपाऊं मैं तो भागी-भागी डोलूं

काम गई भूल मैं तो मन ही मन बोलूं

लहरियो स्हारूं तो म्हारो लहंगो दब जाय

लागै बाईसा थांरो बीरो घर आय।

रोटी जद खावै ही तो जीभ म्हारी कटगी

मुंडै म्हाली रोटी म्हारै गळै मांही अटकी

हिचकी तो डटै कोनी, आयां आयां जाय

लागै बाईसा थांरो बीरो घर आय।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : बी.एल. सावन ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-29
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