खेल-खेल धूळ में हो ज्यासी भाई मोटो।

थारै म्हारै भाग में लिख्योड़े ही टोटो॥

धूळ आपणा सोड़, गुदड़िया

धूळ आपणो मांचो।

धूळ आपणा पोथी पानां

‘धूळ’ मांडकर बांचो।

ओढ़ो चाहे धूळ नै बिछाओ, चाहे लोटो।

थारै म्हारै भाग में लिख्योड़ो ही टोटो॥

आंख्यां मांही धूळ गेर कै

ठगणो जग री कुंजी।

आपां धूळ लगावां माथै

धूळ आपणी पूंजी।

धोळां मांही धूळ पड़्यां ही जग चेतैलो ओटो।

थारै म्हारै भाग में लिख्योड़ो ही टोटो॥

धूळ धिराणी है धोरां री

धोरां में रम ज्यासी।

बखत पड़्यां के बण ज्यावै

तो बखत बतासी।

जापड़, थापड़ करो, धूळ नै देकर प्रेम पळोटो।

थारै म्हारै भाग में लिख्योड़ो ही टोटो॥

जीं दिन धूळ पगां चालैगी

दौड़ धरी रै ज्यासी।

जोड़-जोड़ गांठी धरबा री

होड़ धरी रै ज्यासी।

लागैलो तिजूरियां रै पाछै दिन खोटो।

थारै म्हारै भाग में लिख्योड़ो ही टोटो॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : भागीरथ सिंह ‘भाग्य’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-28
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